Thursday, 2 April 2015

अगर हमारे चश्मे पर धूल जमी हुई है, तो हमें पूरी दुनिया ही धुंधली नजर आएगी। आलोचना करने से पहले हमें अपनी अंतर्दृष्टि को जरूर परखना चाहिए, तभी हमें सब कुछ साफ-साफ नजर आएगा...
एक युवा दंपति ट्रांसफर होकर नए घर में रहने आए। पति-पत्नी अपनी नई गृहस्थी में मन रमाने की कोशिश में थे। घर का सामान व्यवस्थित करने के बाद बालकनी में अच्छे मूड से नाश्ता करने बैठे। सामने के घर में धुले हुएकपड़े सूख रहे थे। 
पत्नी कहने लगीं, 'कितने गंदे कपड़े धोए हैं। शायद इनका डिटर्जेंट ठीक नहीं है। पति नेज्यादा ध्यान नहीं दिया। अगले दिन नाश्ते पर फिर यही बात हुई। कई दिन तक पत्नी पड़ोस में साफ कपड़े न धोए जाने पर अफसोस जताती रहीं। एक दिन रविवार को जब दोनों फुरसत में बालकनी में बैठे तो पत्नी ने देखा कि पड़ोस के कपड़े काफी चमकदार नजर आ रहे हैं। वे व्यंग्य से बोलीं, 'लगता है इन्हें कपड़े धोने का शऊर आ गया है या फिर इन्होंने डिटर्जेंट बदल लिया है। पति ने शांत भाव से जवाब दिया, 'आज सुबह जल्दी उठकर मैंने खिड़की के शीशे साफ किए हैं। कपड़े उनके गंदे नहीं थे, बल्कि हमारी खिड़कियां ही गंदी थीं। पत्नी को काफी शर्मिंदगी हुई। उन्होंने सोचा कि आज के बाद वे कोई भी टिप्पणी करने से पहले खुद की नजर को जांचेंगी। कहने से पहले अपने नजरिये पर ध्यान देंगी, उसके बाद ही कुछ बोलेंगी।
बुरा जो देखन मैं चला...संत कबीर ने कहा है, 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय। जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। इस दोहे में कबीर ने बताया है कि व्यर्थ में हम किसी दूसरे में दोष क्यों ढूंढ़ने लगते हैं ? हमें अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए कि कहीं मुझमें कोई गलती तो नहीं।
हमारी सबसे बड़ी गलतफहमी हमारी यह सोच होती है कि हम ही सही हैं, हमसे कभी भूल नहीं हो सकती। दरअसल, यह हमारा अहं है, जो हमें इस तरह सोचने पर मजबूर करता है। अपनी गलतियों के कारण ही हम दूसरों में दोष खोजते हैं।
हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी का एक अध्ययन बताता है कि जब कोई व्यक्ति सफलता पाता है, तो उसमें 85 फीसदी हिस्सेदारी उसके सकारात्मक नजरिये की होती है। अच्छा नजरिया ही सफलता का सबब बनता है। जिंदगी भी है आईना ।

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